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Friday, August 26, 2011

हजारे जीतें या हारें - चुनौतियां बड़ी हैं

सं
सद की स्थायी समिति के पास है लोकपाल विधेयक। सरकार उसे वापस ले सकती है। इस बीच अरुणा राय और अन्ना हजारे के प्रस्तावित बिल भी संसदीय समिति के पास भेजे जा चुके हैं। अनशन के नौवें दिन बिल के विभिन्न बिंदुओं पर सर्वदलीय बैठक में कोई सहमति नहीं हो सकी और अन्ना टीम के साथ किसी सहमति की उम्मीद भी टूट गई। लेकिन गुरुवार को प्रधानमंत्री ने सदन में कहा कि अन्ना के प्रस्तावित बिल पर संसद में बहस कराई जाएगी। हमें नहीं पता कि स्थायी समिति किस बिल पर विचार करेगी। यह भी नहीं पता कि संसद में बिल के विभिन्न प्रारूपों पर बहस के बाद क्या होगा। क्या फिर कोई नया बिल बनेगा? क्या उस पर संसदीय समिति बहस करेगी? अगर टीम अन्ना के मनचाहे रूप में वह बिल पास नहीं हुआ तो इस आंदोलन का रूप क्या होगा?

निराशा से उपजी आस्था

इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं, पर अन्ना की अगुवाई में शुरू हुए इस आंदोलन से यह बात जरूर साफ हो गई है कि राजनीतिक पार्टियों से आम आदमी का मोहभंग हुआ है। नेताओं के झूठे वादों से बार-बार आहत हुई उसकी आस्था को संभावनाओं का नया ठौर अन्ना के रूप में दिख रहा है। अन्ना ने जनता से कोई वादा नहीं किया है, पर जनता उनसे बार-बार वादा कर रही है कि अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं। आखिर वजह क्या है जो अनिश्चित, अनसुलझे और अनगढ़ रास्ते पर लोग अन्ना के पीछे भागे चले जा रहे हैं? इस आस्था की वजह है हाल के वर्षों में उपजी निराशा।

और कुछ तीखे सवाल

देश के लगभग हर हिस्से से नेताओं के खाने-कमाने के किस्से एक के बाद एक सामने आते गए। करोड़ों-अरबों के घोटाले होते रहे, पर सरकार कभी दलील देती रही, कभी जांच करवाती रही। सत्तापक्ष हो या विपक्ष, सभी मौके की आंच पर मतलब की रोटी सेंकते रहे लेकिन घोटालों के खिलाफ ठोस नतीजे सिफर रहे। ऐसे नाजुक समय में जब लोगों ने देखा कि 74 बरस का एक बूढ़ा खुद को भूखा रख कर नतीजे पाने के रास्ते गढ़ने की कोशिश कर रहा है, तो खाने-पकाने वालों के खिलाफ देश की जनता दौड़ पड़ी।
यह जनता जिस रोमांच और उत्साह के साथ दौड़ी है, उसके पीछे किसी अन्ना की ताकत नहीं बल्कि छलावे से मुक्त होने की चाहत और छटपटाहट है। ऐसे में यह आंदोलन अगर औंधे मुंह गिरा तो? इससे भी तीखा सवाल यह है कि आंदोलन अगर कामयाब हुआ और जनता ने जितनी उम्मीदें इससे बांध रखी हैं, वे पूरी होती नहीं दिखीं तो क्या होगा? इन दोनों स्थितियों से दूर रहने के लिए टीम अन्ना को कई काम करने होंगे। पहला यह कि उन्हें लोकपाल विधेयक की जगह जन लोकपाल विधेयक को लागू करवाने के एकसूत्री आंदोलन को बहूसूत्री बनाना होगा। दूसरा यह कि जनता के सामने यह बात बार-बार रखनी होगी कि इस जन लोकपाल विधेयक के लागू हो जाने मात्र से रामराज आने वाला नहीं, यह तो सुधार की दिशा में एक छोटा सा कदम भर होगा। असल सुधार तब होगा जब हम सवालों से घिरे संसदीय लोकतंत्र को स्वच्छ रूप दे सकें, चुनावी राजनीति में पसरे भ्रष्टाचार को दूर कर सकें।
यह आंदोलन वैसा ही है जैसा 74 का जेपी मूवमेंट था, यह समझने की चूक हमें नहीं करनी चाहिए। जेपी की संपूर्ण क्रांति सीधे-सीधे सत्ता परिवर्तन की मांग पर टिकी थी। कहा जा सकता है कि उसका ध्येय वही था, जबकि अन्ना का आंदोलन भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कर रहा है। गौर करें कि भ्रष्टाचार का मुद्दा अकेले कानून की जिम्मेदारी नहीं है। न ही जन लोकपाल विधेयक जैसे किसी बिल के लागू होने मात्र से यह खत्म हो जाएगा। बल्कि इसके लिए लंबे संघर्ष की जरूरत है। हर आदमी अगर खुद के भीतर बैठे भ्रष्टाचार को खत्म करे, तभी यह खत्म हो सकता है।
अन्ना के इस आंदोलन को एक ऐसी चुनौती का भी सामना करना है जो जेपी मूवमेंट के वक्त नहीं थी। उस वक्त भी समाज में जातीयता थी, पर यह अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों के रूप में नहीं बंटी हीं थी। आज के समाज में अस्मिता की लड़ाई इतनी तेज है और अपनी अलग पहचान की चाहत इतनी बुलंद है कि समाज के हर वर्ग के पास अपनी पार्टी है। हर जगह ये पार्टियां अपनी हिस्सेदारी अपनी अलग पहचान के साथ चाहती हैं। यह बात टीम अन्ना को ध्यान में रखनी होगी ताकि उनके संघर्ष में हर वर्ग शामिल हो सके।

जेपी मूवमेंट के सबक

74 के जेपी मूवमेंट के नतीजे भी टीम अन्ना के जेहन में होने चाहिए। 77 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। जेपी के सुधारवादी आंदोलन का सबसे बड़ा लाभ भारत की कई प्रमुख पार्टियों का विलय कर बनी जनता पार्टी को मिला था, पर आंतरिक मतभेदों के कारण यह पार्टी 1979 में बंट गई। क्या 2014 के चुनाव में 77 दोहराया जाएगा? ऐसा कुछ हो जाए तो बहुत आश्चर्य नहीं। पर इसके लिए जनता किसी ऐसे नेतृत्व को तलाशना चाहेगी जो सच्चा और स्वच्छ हो, जिसकी अगुवाई कोई भरोसे लायक शख्स करे, जिसमें दागदार चेहरों के शामिल होने का डर न हो। टीम अन्ना जनता की इस तलाश पर खरा उतरना चाहेगी या नहीं, यह वक्त बताएगा।
क्षण भर को यह सोचें कि सरकार जन लोकपाल विधेयक को स्वीकार कर लेती है, तो फिर टीम अन्ना किस मुद्दे पर आंदोलन करेगी? क्या इसके बाद वह फिर कोई और नई डिमांड लेकर सामने आएगी? यहां मकसद सिर्फ यह ध्यान दिलाने का है कि टीम अन्ना को इस आंदोलन को जारी रखने के लिए इसे बहुसूत्री बनाना ही होगा। सवाल यह नहीं कि अन्ना और उनके साथ आंदोलन कर रहे लोगों के साथ कितनी बड़ी भीड़ आ जुड़ी है। सवाल यह भी नहीं कि किसी सिस्टम, किसी सरकार या उसके द्वारा कायम व्यवस्था को आप किस तरह से ध्वस्त कर देते हैं। सवाल यह है कि उस ध्वस्त व्यवस्था के मलबे पर आप कोई नई व्यवस्था खड़ी कर पाएंगे कि नहीं। जेपी की बात तो छोड़ दीजिए, गांदी भी देश को आजाद कराने के बाद सत्ता की बंदरबांट देख कर खुश नहीं हो पाए।

Thursday, September 30, 2010

जलेबी और चाकू

किसी गर्म, कुरमुरी, जायकेदार जलेबी को मुंह में रखने
और उसे गप कर जाने से पहले
उसकी खुशबू और उसके रस का पूरा आनंद लेने के बीच
क्या आपने ध्यान दिया है
कि हमारी भाषा
कैसे-कैसे बेख़बर अत्याचार करती है?
अगर किसी को आप जलेबी जैसा सीधा कहते हैं
तो ये उसके टेढ़ेपन पर व्यंग्य भरी टिप्पणी होती है
जबकि सच्चाई यह है
कि अपने रूपाकार को छोड़कर - जिसमें उसका
अपना कोई हाथ नहीं है - वह वाकई सीधी होती है।
पहले रस को अपने भीतर घुलने देती है
और फिर बड़ी आसानी से
मुंह के भीतर घुल जाती है
जो थोड़ा बहुत कुरमुरापन रहता है, वह उसका जायका ही बढ़ाता है।
कभी चाव से जलेबी खाते हुए
और कभी दिल्लगी में दूसरों से अपने जलेबी जैसा सीधा होने की तोहमत सुनते हुए
अक्सर मुझे लगता है
कि वह भाषा भी कितनी सतही होती है
जो बाहरी रूप देखकर
किसी के सीधे या टेढे होने का ऐसा नतीजा तय कर देती है जो घिस-घिस कर मुहावरे में बदल जाता है।
लेकिन यह नादानी है या सयानापन है?
कि लोग जलेबी को टेढा बताते हैं।
यह जानते हुए कि वह कुछ बिगाड़ नहीं सकती
आम तौर पर बाकी पकवानों की तरह हाजमा भी ख़राब नहीं कर सकती।

अगर सिर्फ आकार-प्रकार से तय होना हो
कौन सीधा है, कौन टेढ़ा
तो सीधा-सपाट चाकू कहीं ज्यादा मासूम लगेगा जो
सीधे बदन में धंस सकता है
और जलेबी बेचारी टेढ़ी लगेगी
जो टूट-टूट कर हमारे मुंह में घुलती रहती है।
लेकिन जलेबी और चाकू का यह संयोग
सिर्फ सीधे-टेढ़े के फर्क को बताने के लिए नहीं चुना है
यह याद दिलाने के लिए भी रखा है कि
जलेबी मुंह में ही घुलेगी, चाकू से नहीं कटेगी
और गर चाकू से जलेबी काटना चाहें
तो फिर किसी और को काटने के पहले
चाकू को चाटने की इच्छा पैदा होगी।
यानी चाकू जलेबी को नहीं बदल सकता
जलेबी चाकू को बदल सकती है
हालांकि यह बेतरतीब लगने वाला तर्क
इस तथ्य की उपेक्षा के लिए नहीं बना है
कि जलेबी हो या चाकू - दोनों का अपना एक चरित्र है
जिसे हमें पहचानना चाहिए
और कोशिश करनी चाहिए
कि हमारा रिश्ता चाकू से कम, जलेबी से ज्यादा बने।
लेकिन कमबख्त यह जो भाषा है
और यह जो दुनिया है
वह जलेबी को टेढ़ेपन के साथ देखती है, उसका मजाक बनाती है
और
सीधे सपाट चाकू के आगे कुछ सहम जाती है।

(जी चाहता है यह झूठ सबसे कहूं कि यह कविता मैंने लिखी है। भले लोगों को पता हो कि यह प्रियदर्शन की कविता है और उसके भरोसा ब्लॉग से चुराई गई है।)

Sunday, April 11, 2010

आइए, छलें खुद को

मोह जब हो भंग, तो आदमी खुद को ठगा सा महसूस करता है। उसे लगता है कि वह अब तक खुद को छल रहा था। वैसे खुद को छलने वाले लोग भी होते हैं, आत्ममुग्ध, आत्मरति के शिकार। पर जब वाकई दूसरों के हाथों छले जाएं, तो उनकी पीड़ा मुखर हो जाती है। पीड़ा के ऐसे क्षणों में आखिर आदमी क्या करे, कहां जाए, किससे कहे...। जाहिर है कहीं जाने की जरूरत नहीं। आइए एक गीत सुनें...

Wednesday, March 24, 2010

पत्नी की गैरमौजूदगी और मेरा ओछापन

अनिता, अनुनय और मान्या के बिना शुरू के दो दिन तो मैंने खूब चैन से गुजारे। लगा कि 17 मार्च की खुशियां बरकरार हैं। अगर स्वर्ग होता होगा तो शायद उसका सुख यही है। पर तीसरे दिन से ही मेरा भ्रम टूटने लगा। मुझे मेरा घर अचानक पराया लगने लगा। दफ्तर से लौटता तो यहां का सूनापन मुझे काटने को दौड़ता। डर कर मैं अपने कमरे में मैं सिकुड़ जाता। समझ नहीं पा रहा था कि यह प्यारा सा घर मुझे मकान की तरह क्यों लगने लगा? मेरा स्वर्ग अचानक नर्क में कैसे तब्दील हो गया?

जो लोग पत्रकारिता के पेशे में हैं उनके घर लौटने का वक्त बेहद अटपटा होता है। मेरा भी है। देर रात लौटता था, अनिता और बच्चे तब तक सो चुके होते थे। मैं बस चुपचाप उनके कमरे में झांक आता। उन्हें सोया देख (कभी कभार जगा पाकर) बेहद सुकून मिलता। इस सुकून का अहसास तब कभी नहीं हुआ या कहें कि मेरी कमजोर संवेदनाओं ने उन्हें कभी महसूस नहीं किया। इस दफे उनकी अनुपस्थिति में वह अंतर मुझे पता चला। रात घर लौटने के बाद जब मुझे उनका कमरा खाली दिखता तो वह खालीपन मेरे भीतर भी बजने लगता। वाकई मैं बेचैन हो जाता। घर में उन तीनों का न होना मुझे बेहद खटकने लगा।

अनिता के जाने के बाद शुरू की दो रातें मैंने या तो टीवी देखते हुए बिताईं या कुछ पढ़ते हुए। अगली सुबह मैं काफी देर से जगा। देर से जगने का कोई अफसोस नहीं था क्योंकि मैं तो अपनी आजादी में डूबा था। पर धीरे-धीरे मुझे बात समझ में आई कि जिसे मैं आजादी समझ रहा था वह वाकई मेरे सिस्टम का डैमेज हो जाना था। ठीक वैसे ही जैसे जब शरीर का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा साथ छोड़ने लगता है तो आपका शरीर आपके वश में नहीं होता। वह तेजी से काम करता है, पर कब कौन सा काम वह करे इस पर न तो आपका वश चलता है न ही आपको अहसास होता है कि वह आपके मुताबिक नहीं चल रहा।

घर में पत्नी और बच्चों के होने से कितना फर्क पड़ जाता है माहौल में। कभी आप बच्चों से खेलते हैं, कभी समझाते हैं और कभी उन्हें डांटते भी हैं। ठीक उसी तरह पत्नी से तमाम तरह की बातें आप शेयर करते हैं - कभी दफ्तर का तनाव, तो कभी किसी सब्जेक्ट पर विचार-विमर्श। और इन स्थितियों के बाद आपका मुकम्मल चरित्र बन कर उभरता है। आप अपने व्यक्तित्व के अधूरेपन को पत्नी और बच्चों के साथ होकर ही पूरा कर पाते हैं।

अभी ध्यान जा रहा है कि इतने वर्षों से मैंने तो अनिता से खुद को शेयर किया। अक्सर अपनी बातें उनसे कीं। पर क्या कभी अनिता की बातें मैंने सुनीं? पत्रकारिता या समाज को लेकर जो सवाल मुझे मथते हैं, क्या वह अनिता को नहीं मथते होंगे? मैं कैसे भूल गया कि उसके भीतर भी पत्रकार बनने की ख्वाहिश थी। इकोनॉमिक्स में एमए और बैचलर ऑफ जर्नलिजम कर लेने के बाद उसे भी अपने करियर की चिंता थी। पर शादी के बाद उसने पूरी दृढ़ता से कहा था कि मैं घर संभालूंगी। आखिर उसने अपने करियर को तिलांजलि दी तो किसके लिए? जाहिर है इस परिवार के लिए। मुझे मुखिया की तरह स्वीकार किया - क्या यह उसकी कमजोरी थी? आज मेरा मानना है कि यह उसकी दृढ़ता थी। दृढ़ता इस अर्थ में कि जो हल्के होते हैं वही उड़ते हैं, जो अपनी धुन के पक्के होते हैं उन्हें अपने फैसलों पर टिके रहना आता है।

और ऐसी नायाब साथी से मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की उसके भीतर की हलचल। उफ्, यह मेरा कौन सा ओछा रूप है? मेरा यह रूप मुझ से छुपा कैसे रहा? मेरे इस ओछेपन को अनिता कितने सहज भाव से स्वीकार करती रही। मैं समय-समय पर उसपर गरजता रहा और वह लगातार त्याग और समर्पण के साथ मुझ पर बरसती रही। क्या त्याग करना सिर्फ औरतों के हिस्से है? यह काम मर्द प्रकृति में क्यों नहीं?

मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान अनिता कुछ वैसे ही रखती रही है जैसे अपने बच्चों का। इन सात दिनों ने मुझे जीवन के कई पहलुओं से रू-ब-रू कराया है। मेरे ही छुपे हुए कई रूपों को मेरे सामने रखा है। अनिता के बारे में सोचने की नई दृष्टि दी है। मेरे भीतर बसे बेशर्म मर्द को शर्मिंदा किया है। अब तो बस इंतजार है कि अनिता लौटे तो उसे बताऊं कि मैं तुम्हारा पति नहीं बल्कि तुम्हारा साथी हूं। ऐसा साथी जो सिर्फ 'मैं' की भाषा नहीं बोलेगा, वह 'हम' की भाषा बोलेगा। हां अनिता, यह घर मेरा नहीं, हमारा है। हमारा यह घर तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रहा है। रियली आई लव यू।

Thursday, March 18, 2010

खुशियां हैं बरकरार

सुबह 5 बजे सोने गया और अब 10:30 बजे सो कर उठा हूं। कोई शोरगुल नहीं। खूब गहरी नींद आई। सोकर उठा तो मोबाइल में 18 मिस्ड कॉल दिखी। चार बार मेमसाब (मेरी श्रीमती जी) ने फोन किया था। बाकि 14 साथी-संगतियों की कॉल थी। सोचा था इन सात दिनों में पुराने बचे कई काम निबटा लूंगा। कुछ लेख लिखने थे, जिनके तगादे काफी तेज हो गए हैं। बातें जेहन में हैं पर मन आसमां में उड़ रहा है। कैसे लिखूं? लिखने की इच्छा नहीं हो रही। बस इन दिनों वही कर रहा हूं जो इच्छा होती है। लेख लिखने की इच्छा नहीं है तो लिखूंगा भी नहीं। बाकी दिनों में तो यह सोच कर कर लिया करता था कि चलो करियर के रास्ते में कहीं ये चीजें सपोर्टिव होती हैं। पर इन दिनों जब सोचता हूं करियर की बात तो मन से फूटती है आवाज - यार काहे को लफड़ा मोल ले रहा है। चल मस्ती कर। बस फिर क्या? हंसी-ठिठोली। कभी टीवी पर खबरें देख लीं तो कभी चैनल बदल-बदल कर फिल्में। ज्यादा इच्छा हुई तो मनपसंद सीडी निकाली, गाने सुन लिए या फिल्म देख ली।

Wednesday, March 17, 2010

आजादी की पहली सुबह

पिछले कई दिनों से इस सत्रह मार्च का मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था। रोज जीटॉक के स्टेटस मेसेज में इस दिन के इंतजार में मेसेज बदल रहा था। संगी-साथी पूछ रहे थे कि क्या मामला है। मैं क्या बताता उन्हें। डरा मैं भी था कि श्रीमती जी ने कहीं टिकट कैंसल करा दिया तो? बहरहाल, श्रीमती जी सोलह मार्च की शाम मायके गईं। चैन के सात दिन गुजारूंगा। जब से दिल्ली आया। घर में अकेला रहने को तरस गया। इस बार जब से टिकट कटा, दिन काटने मुश्किल हो गए थे। सत्रह तारीख का बेसब्री से इंतजार करता रहा। सोलह की शाम उन्हें ट्रेन में बैठा, दफ्तर आया। वीकली ऑफ होने के बावजूद किसी और दिन दफ्तर आना थकान पैदा कर देता था। पर सोलह को ऐसा कुछ नहीं हुआ। बिल्कुल तरोताजा रहा। घर आया और देर तक इस खुशी को महसूस करता रहा। इन सात दिनों में कोशिश होगी कि अपने इन खूबसूरत दिनों का ब्यौरा यहां पेश करता रहूं। फिलहाल तो ब्लॉगिंग की भी इच्छा नहीं हो रही है। यह तो पहले भी करता रहा। इसके लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। हां चलता हूं टीवी देखूंगा। आज मुझे कौन रोकेगा भला। :-)

Sunday, February 14, 2010

हांफती हुई पीढ़ी का वैलंटाइंस डे

प्यारी बेटा,

कैसी है तू? पढ़ाई-लिखाई का क्या हाल है? समय का इक्वल डिस्ट्रिब्यूशन किया है न? देख बेटा, पढ़ाई के साथ मस्ती भी बेहद जरूरी है। जितनी ईमानदारी से पढ़ती है उतनी ईमानदारी के साथ मस्ती भी कर। किसी एक चीज पर पिले रहने से मुकाम तो हासिल कर लेगी, पर पर्सनैलिटी नहीं। इसलिए जरूरी है बेटा कि मस्ती और पढ़ाई दोनों साथ-साथ हों। जिस फील्ड को जब जैसी जरूरत हो, उसे उतना ही वक्त दो।

जानती है बेटा, अभी रात के २ बज रहे हैं। दरअसल, मैं रात में देर से लौटा हूं। तेरी ममा ने बताया कि तेरे से लंबी चैट हुई उनकी। सुना कि सैटरडे को तेरा शेड्यूल बहुत टाइट था। बेहद थकी हुई थी तू। क्यों इतना स्ट्रेन लेती है रे, एकाध क्लास मिस ही कर जाती तो क्या आफत आ रही थी? पगली।

मुझे पता है कि संडे की सुबह तू देर से उठेगी। उठेगी और लैपटॉप से चिपक कर मेल चेक करेगी। इसीलिए अभी इस खत को मेल कर दूंगा। अरे बेटा! कल तो वैलंटाइन्स डे है। बता-बता, क्या प्लानिंग है तेरी? अभी तक किसी ने मेरी बेटी को प्रपोज किया या नहीं… या मेरी बेटी ने किसी को...?

याद है तुझे... जब तू नर्सरी या प्रेप में थी... तू बेहद परेशान रहती थी कि तेरे चेहरे का कलर ब्राउन क्यों है? क्या तुझे आज भी तेरा ब्राउन कलर परेशान करता है? ना, बेटा ना। ब्राउन कलर हो या वाइट - अगर चेहरे पर ताजगी न हो, उत्साह का कोई रंग वहां न हो, तो वह चेहरा बेजान लगता है। और तू तो शुरू से हर मामले में उत्साही रही है। चाहे काम मुश्किल हो या आसान, छोटा हो या बड़ा – तू उसे लगन से करती रही है। तेरे भीतर यह जो गुण है न – बेशक इसे तूने अपनी ममा से लिया है – यह तुझे भीड़ में भी एक पहचान देता है, तुझे बिल्कुल डिफरेंट लुक देता है।
बेटा, तू अब बड़ी हो चली है। तुझमें संवेदना जितनी गहरी है, विचार उतने ही गंभीर।

इसीलिए तेरे सामने मैं सिर्फ स्थितियां रखा करता हूं, फैसले का अधिकार तुम्हारा होता है। पर बेटा, एक बात ध्यान रखना कि कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जिन्हें जब चाहो बदल सकती हो और कुछ ऐसे - जिनके साथ जीने की आदत डालनी पड़ती है। इसे यूं समझ कि जिंदगी गर एक रेलवे स्टेशन है, तो कुछ फैसले इस स्टेशन की दूकाने हैं, जिनके बदलने से स्टेशन का रूप बदलता है, प्रकृति नहीं। पर जब रेलवे ट्रैक की जगह मेट्रो, ट्राम या मोनो रेल की ट्रैक बिछा दी जाए तो रेलवे स्टेशन की प्रकृति बदल जाएगी। इसीलिए ये फैसले ऐसे नहीं होते कि जब चाहा बदल लिया। ऐसे फैसले करने से पहले खूब सोच-विचार करना पड़ता है। अपने को आजमाना पड़ता है। यस या नो के तर्कों को परखना पड़ता है। जीवनसाथी चुनने का फैसला भी ऐसा ही फैसला होता है।

बेटा, कोई इनसान सौ फीसदी सही नहीं होता। सही और गलत की परिभाषा भी नितांत निजी हो सकती है। पर कुछ ऐसे मानक भी हैं जो हमें हमारे समाज से मिले हैं। उसी समाज से, जिसे हमने रचा है। इस बदलते दौर में जब समाज का व्यवहार तेजी से बदला तो इसके मानक भी बदले। पर हमारी पीढ़ी पुराने मानकों को पकड़ कर लटकी है, तुम नए मानकों के साथ उमंग में डूबी झूल रही हो। पीढ़ियों की इस खाई को पाटना बेहद जरूरी है। जानती हो, यह खाई हर दौर में बनती है। जब मैं यूथ था, तब भी मैंने यह खाई देखी थी। मेरे पापा जब यूथ रहे होंगे तो उन्होंने भी ऐसी खाई देखी होगी, मेरे पापा के पापा ने भी...। और हर बार बूढ़ी होती हुई पीढ़ी को हांफते हुए ही सही पर दौड़ना पड़ा होगा। नए बन रहे मानकों के रास्ते के कंकड़-पत्थर चुनने पड़े होंगे। यही तो प्रकृति है, यही तो नेचर है।
बेटा, रील लाइफ हर यूथ को बेहद लुभाती है। वहां की रंगीनियां, वहां के लुभावने पल, वहां की मस्ती खींचती है। उन तीन घंटों में वह भूल जाता है अपनी रीयल लाइफ की दुश्वारियां, वे तकलीफें - जो मध्यवर्गीय परिवारों की पहचान बनती गई हैं। और फिर रील लाइफ के जादूघर से बाहर निकलते ही अचेतन में बस चुके नायक-नायिका उसे मुंह चिढ़ाते हैं। उनकी सम्पन्नता तो वह ईमानदार तरीके से छू नहीं पाता, पर उनका दैहिक प्रेम यूथ के जलते मन और तन को भड़काता है। जब कभी अवसर मिले वह तन-मन को साधने की जुगत में लग जाता है। भावावेश में साथ जीने-मरने की कसमें खाता है। रिश्ते की सामाजिक स्वीकृति की बाध्यता उसे शादी तक पहुंचाती है। पर बहुत जल्द ही अचेतन के नायक-नायिका की छवि टूटती है। जीवन की जरूरतों के सामने भावनाएं आहत होने लगती हैं। जितनी तेजी से जुड़े थे, उतनी ही तेजी से बिखरने लगते हैं। बेटा, इस बिखराव की वजहें तो कई हैं पर उन वजहों पर हम फिर कभी बात करेंगे।

फिलहाल तू जा बेटा, तैयार हो। अपने दोस्तों के साथ एंजॉय कर आज का दिन। और हां, जब लौटकर आना तो मुझे कॉल करना (अगर तू थकी न रहे तो), मैं ऑनलाइन हो जाऊंगा। वैसे भी संडे है। मैटिनी शो लेकर जाऊंगा तेरी ममा को, पर तेरे लौटने से पहले लौट आऊंगा।
तेरा पापा

Saturday, January 23, 2010

क्या यही है न्यूज चैनलों का सच?

लेक्ट्रॉनिक मीडिया दूर से जितना लुभावना लगता है उसका सच उतना ही भयानक है। मेरी एक बेहद करीबी मित्र जो दिल्ली के एक न्यूज चैनल में काम करती थी। पर वहां उसे अपने बॉस के अप्रोच ने इस कदर डरा दिया कि उसने नौकरी छोड़ दी। उसने कसम खाई कि वह कभी किसी इलेक्ट्रॉनिक चैनल में काम नहीं करेगी। हालांकि उसके नौकरी छोड़ देने का समर्थन मैं कभी नहीं करूंगी पर उसके साथ हुए घटनाक्रमों को संकेत में जरूर आपसे शेयर करूंगी। इस शेयरिंग की मंशा महज इतनी है कि आप ऐसे बॉसों के बारे में एक राय बना सकें कि कभी ऐसे लोगों से सामना हो जाए तो आपको क्या करना है। बहरहाल यहां उन सारी घटनाओं को रखने के लिए मैं अपनी मित्र की पहचान छुपाते हुए उसे श्रेष्ठा नाम दे रही हूं। श्रेष्ठा ने अखबार की नौकरी से करियर की शुरुआत की थी। दो साल वहां काम करने के बाद उसने टीवी चैनल में काम करने का मन बनाया। एक छोटे से न्यूज़ चैनल में उसे रिपोर्टर की जॉब मिल गयी। न्यूज चैनल में जॉब मिलते ही उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।

काम शुरू करने के कुछ दिन बाद ही उसने किसी बड़े चैनल में जाने का सपना देखना शुरू कर दिया और अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए उसने बेतरह मेहनत की। दिन है या रात, सुबह है या शाम जब जरूरत हो फील्ड में जाने को तैयार रहती थी श्रेष्ठा। वहां काम करते हुए उसने जाना, सुना कि चैनल में काम करने वाली कुछ लड़कियां अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए किस हद तक समझौता करने तैयार हो जाती हैं। ऐसे किस्सों से उसे कई बार आश्चर्य होता। वह खुद से सवाल करती कि ये लड़कियां अपने काम के बल पर क्यों आगे नहीं बढ़ना चाहतीं? ऐसी बातें सुनकर श्रेष्ठा का मन बहुत बार ख़राब होता रहा। तब उसने खुद से वादा किया कि इसी चैनल में काम करके वह अपने काम के दम पर आगे बढ़ेगी। वह मुकाम पाने के लिए किसी बॉस से कभी कोई ऐसा समझौता नहीं करेगी, जो खुद की निगाहों में उसे गिरा दे। उसी दिन उसने ब्लैंक डेट का एक रिजिग्नेशन लेटर तैयार किया और अक्सर उसे अपने पास रखने लगी।

उसकी नौकरी को महज़ पांच महीने बीते थे कि एक रोज एक सीनियर अधिकारी ने श्रेष्ठा को अपने केबिन में बुलाया। श्रेष्ठा के दिमाग में पता नहीं क्या आया कि उसने पर्स से निकाल कर अपने रिजिग्नेशन लेटर को जींस पैंट की जेब के हवाले कर लिया। अंदर पहुंचते ही सीनियर ने श्रेष्ठा को बैठने के लिए कहा। श्रेष्ठा का मन आशंकित था। कई सवाल आ-जा रहे थे। आखिर ऐसा क्या हो गया उससे कि सर ने केबिन में बुला लिया? कुछ पल की ख़ामोशी के बाद सीनियर ने श्रेष्ठा के काम की तारीफ़ की पर पता नहीं क्यों श्रेष्ठा को तारीफ का वह अंदाज नहीं जंचा। केबिन में सफोकेशन का अहसास उसे हुआ। उसका मन बेचैन हो रहा था और वह बाहर जाना चाहती थी। अचानक उसके सर ने उससे पूछा - तुम अपने काम के प्रति कितना सीरियस हो? श्रेष्ठा ने तुरंत जवाब दिया - बहुत ज्यादा। पर सर के अगले सवाल ने श्रेष्ठा के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी। सर ने पूछा - क्या तुम अपने प्रमोशन के लिए मेरे फार्महाउस पर चलोगी? सवाल सुनकर हतप्रभ थी श्रेष्ठा। नथुने फड़कने लगे। चेहरे पर छाई रहने वाली स्निग्ध मुस्कुराहट की जगह ले ली नफरत ने। उसे लगा अगर कुछ पल वह वहां और खड़ी रह गई तो कोई बड़ा बवाल हो जाएगा। हो सकता है श्रेष्ठा खुद पर काबू न रख सके और कोई वजनी चीज उसके सिर पर मार दे। उसने जेब से हाथ बाहर निकाला। गुस्से में कांप रहे थे हाथ। पर हाथ में थमा पत्र देखते ही पूरी हिम्मत आ गई। उसने अपना रिजिग्नेशन लेटर उसकी टेबल पर फेंका और बाहर आ गई। अपने टेबल से अपना सामान उठाया और बिना किसी से कुछ कहे ऑफिस से निकल गयी। अगले दिन ऑफिस से उसके लिए फ़ोन आने शुरू हो गए, किसी को उसने रिसीव नहीं किया... पर वहां की एक सीनियर मैम के फोन को श्रेष्टा ने रिसीव कर लिया। उन से बात हुई। श्रेष्ठा ने सारी बातें मैम को बताईं,यह सोचकर कि शायद वह एक लड़की के मनोभाव समझ सकें। पर अफसोस महिला होकर भी उन्होंने उस इंसान (?) का पक्ष लिया जिसने श्रेष्ठा को प्रमोशन देने के पीछे शर्त रखी कि फार्महाउस चलो।

सर के केबिन में गुजरे इस मिनट के वक्त ने श्रेष्ठा के पूरे विश्वास को हिला दिया है। इतनी बार इस यातना की चर्चा वह मुझसे कर चुकी है कि केबिन का हर पल मुझे दिखने-सा लगा है। उस यातना को सिर्फ श्रेष्ठा ने नहीं जिया, उसकी मित्र होने के नाते मैंने भी जिया है। सबसे तकलीफदेह बात यह लगी कि श्रेष्ठा को यह लगने लगा है कि चैनल में जो भी लड़कियां ऊंचे पद पर पहुंच गई हैं उन्होंने जरूर अपने किसी सीनियर से समझौता किया होगा। वर्ना वह मैम क्यों नहीं उसकी बात समझतीं? क्यों वह उस राक्षस का पक्ष लेतीं। मैं कहना चाहती हूं श्रेष्ठा से कि सारे लोग तुम्हारे उस बॉस जैसे नहीं होते और न ही चैनल की सारी लड़कियां समझौते करके आगे बढ़ती हैं। पर अभी श्रेष्ठा के भीतर भरोसा जगाने में वक्त लगेगा मुझे। तब तक के लिए मैं भी उसके लिए संदिग्ध हूं, और आप तो खैर हैं ही...

यह टिप्पणी नमिता शुक्ला की है, जो उन्होंने ईमेल के जरिए मुझ तक पहुंचाई । दुआ करें कि वह वक्त लौट आए जब हम और आप किसी श्रेष्ठा की निगाह में संदिग्ध होने को अभिशप्त न हों।
- अनुराग अन्वेषी

Saturday, December 19, 2009

कौन कहता है कि 'पा' अमिताभ बच्चन की फिल्म है

पा
में न अमिताभ दिखते हैं, न उनकी एक्टिंग की ऊंचाई। दरअसल, उस करेक्टर में अभिनय की गुंजाइश ही नहीं थी। अमिताभ की एक्टिंग देखनी हो तो ब्लैक जैसी दर्जनों फिल्में हैं। इसलिए कहना पड़ता है कि यह फिल्म किसी एक्टर के लिए नहीं याद की जाएगी। कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक के लाजवाब मेकअप और बाल्की के जबर्दस्त निर्देशन और सधी हुई स्क्रिप्ट के लिए याद की जाएगी।
मैं यह नहीं कतई नहीं कह रहा कि पा फिल्म बेकार है। पा फिल्म तो वाकई तारीफ पाने की हकदार है। पर इसलिए नहीं कि वह प्रोजेरिया से पीड़ित एक बच्चे की कहानी है, या इसलिए भी नहीं कि प्रोजेरिया से पीड़ित १२ साल के बच्चे औरो की भूमिका में बिग बी ने 'कमाल' कर दिया है। इसलिए तो कतई नहीं कि जूनियर बी ने बिग बी के पिता का रोल किया।

तारीफ इसलिए होनी चाहिए

- कि इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से।
- कि ऐड एजेंसी के क्रिएटिव हेड रहे बाल कृष्णन (बाल्की) चूक गये। वह चाहते तो स्क्रिप्ट की डिमांड के तर्क के साथ विद्या बालन और अभिषेक के अंतरंग क्षणों की शूटिंग कर सकते थे। फिल्म के प्रोमो में इन दृश्यों को ठूंस कर दर्शकों का बड़ा हुजूम खींच सकते थे।
- कि बाल्की ने वाकई पा को भुनाने के लिए किसी सस्ते हथकंडे का इस्तेमाल न कर अपनी क्रिएटिविटी पर भरोसा किया।
- कि यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।
- कि निर्देशकीय पकड़ इतनी सख्त है कि फिल्म के करेक्टरों की तमाम मासूमियत आपके साथ चलने लगती है। आप उस अमोल आम्टे के लिए आक्रोश भी नहीं पाल पाते, जिसकी वजह से पैदा हुए तनाव का असर एक बच्चे की जिंदगी पर पड़ता है। यह असर इतना भयंकर है कि बच्चा पैदा हुआ तो अपने को प्रोजेरिया से घिरा पाया। फिल्म हॉल से निकलते ही औरो आपके जेहन में घूम रहा होता है, शेष करेक्टर महज औरो को बुन रहे होते हैं।

नहीं है इसमें बिग बी का चमत्कारिक अभिनय

कुछ फिल्में अपनी शानदार तकनीक की वजह से याद की जाती हैं, तो कुछ शानदार एक्टिंग की वजह से। किसी में स्क्रिप्ट जानदार होती है तो किसी में निर्देशन शानदार। तकनीकों का कमाल अब की हिंदी फिल्मों में दिखने लगा है। गाहे-बगाहे लीक से हटकर किया गया मेकअप भी पब्लिक का ध्यान खींचता रहा है। पर पा में जिस करेक्टर के इर्द-गिर्द पूरी फिल्म घूमती है वह है औरो। इस औरो का मेकअप इतना सटीक है कि दर्शक उसके करेक्टर की खासियतों से बगैर संवाद जुड़ जाता है। किसी करेक्टर को जीवंत बनाने में एक्टिंग का बड़ा योगदान होता है। एक्टिंग के तीन खास पक्ष होते हैं - फेशिअल एक्स्प्रेशन, बॉडी लैंग्वेज और वाइस मोड्यूलेशन। फिल्म की बाकी तमाम चीजें एक्टिंग के इन तीन खास पॉइंट्स का साथ देती हैं। पा में औरो का मेकअप ऐसा है कि फेशियल एक्सप्रेशन की गुंजाइश किसी आर्टिस्ट के लिए बच नहीं पाती। रही बात बॉडी लैंग्वेज की, तो जाहिर है वह अपंग बच्चे जैसी ही होगी। यह काम किसी भी प्रफेशनल आर्टिस्ट के लिए जरा भी मुश्किल नहीं। हां, वाइस मॉड्यूलेशन में सामान्य सी गुंजाइश थी जिसे बिग बी ने आसानी से पूरा किया।
तो फिर ऐसी सामान्य-सी एक्टिंग के लिए बिग बी का ही सिलेक्शन क्यों हुआ? और हुआ भी तो बिग बी जैसे आर्टिस्ट ने इसे स्वीकार क्यों कर लिया?
दरअसल, बाल्की ऐड एजेंसी के हेड रहे हैं। उन्हें खूब पता है कि किसी प्रोडक्ट को बेचने के लिए ऐड कैसा होना चाहिए। पा जैसे प्रोडक्ट (जो लीक से हटकर है) का बाजार बनाना आसान नहीं था। इसे चर्चा में लाने के लिए बिग बी से बड़ा नाम दूसरा हो नहीं सकता था। विज्ञापन की आंखों ने यह भी देखा कि बिग बी की उम्र 70 के आसपास है और पा के औरो की 12 के आसपास। तो उम्र के इस कंट्रास्ट को भुनाया जा सकता है। प्रोडक्ट के बिकने के रास्ते में जो थोड़ी बहुत हिचक रही होगी उसे उन्होंने जूनियर बी को जोड़ कर दूर कर लिया। क्योंकि अब बाल्की के पास प्रचार के लिए करेक्टर और कलाकार का कंट्रास्ट तो था ही, बिग बी (बेटा) और जूनियर बी (बाप) के रोल की केमेस्ट्री भी थी। विज्ञापन की आंखों ने वाकई अपना असर दिखाया।
हर कलाकार की चाहत होती है कि वह खुद को डिफरेंट रंगों में देखे। औरो के असामान्य रंग में खुद को देखने की ख्वाहिश बिग बी की भी रही होगी - यह समझा जाये, तो यह समझ दोषपूर्ण नहीं। हां, यह जरूर है कि इसके अलावा भी कुछ कारण रहे होंगे जिन्होंने बिग बी को बाध्य किया होगा इस रोल को स्वीकार करने में।

विद्या का प्रेम, आम्टे का पलायन

पा में विद्या मेडिकल स्टूडेंट है। जीवन के किसी मोड़ पर उसकी मुलाकात अमोल आम्टे नाम के नौजवान से हो जाती है। बढ़ते भरोसे के साथ दोनों की मुलाकातें भी बढ़ती हैं। मुलाकातों के बढ़े अंतरंग कदम का पता उन्हें तब चलता है जब उनके सामने सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं - या तो शादी या अबॉर्शन।
आम्टे बेहद महत्वाकांक्षी करेक्टर है। भरोसे से लबरेज। उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उसका करियर है। इस करियर के रास्ते में किसी भी 'लिजलिजी संवेदना' के लिए कोई जगह नहीं। ऐसे हर बैरियर को कुचलते और लताड़ते हुए उसे आगे बढ़ना है। एक बड़ा और जिम्मेवार नेता बन कर देश का भविष्य संवारना है। यही सीख वह विद्या को भी देता है। उसे याद दिलाता है कि अगर बच्चे-वच्चे के फेर में वह पड़ी तो उसके डॉक्टर बनने का ख्वाब अधूरा रह सकता है। बेहतर होगा अबॉर्शन करा ले।

दो स्त्रियों का हौसला

विद्या मजबूत इच्छाशक्ति वाली करेक्टर है। जो किया, उसपर कोई पश्चाताप नहीं। जो आएगा उसका सामना करना, उससे जूझना, उसे जीना विद्या को ज्यादा पसंद है। विद्या की मजबूती के पीछे उसकी मां का भी हौसला है, जो - हे भगवान, तूने ये क्या किया - जैसे किसी संवाद से कोसने की बजाए विद्या से पूछती हैं कि तुम्हें बच्चा चाहिए या नहीं? जब विद्या बच्चे को जन्म देने की अपनी इच्छा जताती है तो मां उसे गले लगा लेती हैं। वह घर और बच्चे की पूरी जिम्मेवारी इस कदर ओढ़ लेती हैं कि विद्या का करियर न डगमगाए। दोनों स्त्रियों के इस संघर्ष और दृढ़ता की कहानी कहता है विद्या का डॉक्टर बन जाना।
विद्या और अमोल आम्टे आज की पीढ़ी का प्रतिनिधि चरित्र हैं, जबकि विद्या की मां रहन-सहन से पारंपरिक होते हुए विचारों से आधुनिक महिला की प्रतिनिधि पात्र।

पत्रकारों की नादानी

फिल्म पा दिखलाती है कि आम्टे समझदार और ईमानदार युवा एमपी है। किसी करप्शन का वह साझीदार नहीं। वह समाज के वंचित वर्ग के लिए काम करना चाहता है, पर दलाल मार्का नेता राह का रोड़ा बनते हैं। इस कड़ी में कुछ पत्रकार भी हैं, जो अपनी नासमझी और नादानी से इस रोड़े को चट्टान में तब्दील करते हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज की हड़बड़ी में कैसे न्यूज का मर्म तोड़ते करते हैं। सेंसेशनल बनाने के चक्कर में न्यूज को डिफरेंट शेप और सेंस देते हैं। अपनी सतही जानकारी और अधकचरी सूचनाओं से दर्शकों और पाठकों को गुमराह करने वाले पत्रकारों को आईना दिखाती है यह फिल्म।

आम्टे का पश्चाताप

फिल्म जब अंत के करीब पहुंचती है, तो अमोल आम्टे को पता चलता है कि औरो उसका बेटा है। हालांकि दोनों की मुलाकात से ही फिल्म शुरु हुई है। आम्टे एमपी बन चुका है। पर तब आम्टे के लिए औरो महज एक ऐसा बच्चा है जिसे प्रोजेरिया ने जकड़ रखा है। आम्टे के भीतर उस असामान्य बच्चे के लिए सिम्पैथी के भाव हैं। वह उसकी हर मुराद पूरी करना चाहता है। इसी क्रम में कई बार वह उसके नाज-नखरे भी सहता है। वैसे तो हर बच्चे का मन बहुत कोमल होता है, पर किसी बीमार बच्चे का मन हर किसी को कुछ ज्यादा ही कोमल लगने लगता है। ऐसा ही होता है आम्टे के साथ भी। उसके मन में औरो के लिए खास जगह बन जाती है। ऐसे में जब उसे पता चलता है कि औरो का वक्त अब खत्म होने वाला है, तो बेचैन सा वह भागा चला आता है उस हॉस्पिटल में जहां औरो एडमिट है। औरो के वॉर्ड में पहुंचते ही उसकी मुलाकात विद्या से होती है और आम्टे को पता चलता है कि औरो उसका बेटा है।
एमपी बन चुके आम्टे को अपनी चूक का अहसास होता है। जिसे उसने कभी लिजलिजी संवेदना समझा था, आज उस संवेदना को महसूस कर रोमांच से भर रहा है। इस बीच आम्टे और औरो के रिश्ते की बात उसके विरोधियों और मीडिया तक भी पहुंच जाती है। सब इसे अपने तरीके से भुनाने में जुट जाते हैं। पर आम्टे बगैर किसी लाग लपेट के इस सच को स्वीकार करता है। वह स्वीकार करता है कि उसने एक नाजुक मोड़ पर जो फैसला किया था, वह गलत था और अब वह अपनी गलती को सुधारना चाहता है।
फिल्म का यह दृश्य अपने संदेश की वजह से बहुत मजबूत बन पड़ा है। किसी भी चूक की आत्मस्वीकृति के लिए बड़ी हिम्मत की जरूरत होती है। क्या वाकई यह हिम्मत हममें है?

औरो के पीछे भागती एक छोटी बच्ची

पूरी फिल्म में साथ के लिए औरो के पीछे भाग रही एक बच्ची दर्शकों का ध्यान अपनी ओर बार-बार खींचती है। फिल्म हॉल में बैठे दर्शकों को कभी यह बात गुदगुदाती है तो कभी मंद मुस्कान से घेर लेती है। पर फिल्म जब अपने अंत के करीब पहुंचती है तो पूरी फिल्म में बिना संवाद के मौजूद इस लड़की की उपस्थिति की सार्थकता नजर आती है। वह हॉस्पिटल में आई है बीमार औरो से मिलने। उसके हाथ में एक कागज है। वही कागज जो वह ऑरो को इससे पहले भी देना चाहती थी, मगर औरो के भाग जाने के कारण कभी दे न पाई। इस कागज में एक स्केच बना है। यह औरो की ही तस्वीर है। पर इसमें लकीरें नहीं हैं। पूरा स्केच तैयार है सॉरी के रोमन लेटर से। वह कहती है कि वह वाकई डर गई थी पहली बार औरो को देख कर। अनजाने में उसने औरो का उपहास उड़ाया था। पर उसने उस भूल को स्वीकारने की कई बार कोशिश की, पर औरो ने उसे यह वक्त कभी नहीं दिया। वह कहती है कि जीवन में जब कोई गलती हो जाए, तो उससे दूसरों को तो दुख होता ही है, पर गलती करने वाले को जब अपनी गलती का अहसास होता है तो उसे सामने वाले शख्स से ज्यादा पीड़ा होती है।
जीवन में अगर हम भी इसी तरह चीजों को समझने लगें तो कई ऐसे रिश्ते जो टूट चुके हैं, जुड़ते नजर आएंगे।

और अब औरो की बात

औरो। बारह साल का बच्चा। प्रोजेरिया से पीड़ित। बेहद संवेदनशील। बिल्कुल अपनी मां और नानी की तरह। स्कूल के बच्चों के बीच उसकी खास पहचान। अपनी थकान से कई बार हतप्रभ सा। कई बार क्षुब्ध सा। पर ऐसा नहीं कि उसका क्षोभ दूसरों पर उतार दे। उसे पता है कि उसे मसालेदार चीजें नहीं खानी। वह नहीं खाता। खिचड़ी खा कर संतोष कर लेता है। उसे मां ने बता दिया है कि उसका पिता एमपी अमोल आम्टे है। उसे यह भी पता है कि आम्टे को उसका ही राज नहीं पता। वह कई बार आम्टे से मिलता है, पर उसे नहीं बताता है। एकाध दफे बताने को होता है फिर अपनी ही बात को बालसुलभ चंचलता से ढंक लेता है। चंचलता के इस आवरण में छुपी उसकी गंभीरता दर्शकों को लुभाती है।

निर्देशन में खटकने वाली एक बात

औरो बहुत नाजुक है। इतना नाजुक कि वह पत्थरों पर बैठ नहीं सकता। क्रिकेट के मैदान में थोड़ा दौड़ जाये तो हॉस्पिटल पहुंच जाता है। पर वही औरो जब फील्ड में या मेट्रो ट्रेन में मंकी डांस करता है, तो उसका शरीर न तो थकता है, न उसे किसी सहारे की जरूरत पड़ती है। इन दो दृश्यों में औरों का शरीर अलग-अलग तरीके से बिहेव करता है। लगता है बाल्की यहां पर मंकी डांस करवाने के लोभ का संवरण नहीं कर पाये।

Monday, November 9, 2009

मी मंदबुद्धि मुंबईकर बोलतो आहे


रामदास कदम को एनडीटीवी पर बोलते सुना। शुक्र है उनका कि यहां वह हिंदी में बोल रहे थे। उसी हिंदी में जिसमें शपथ लेते समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी के साथ उन्होंने हाथापाई की। इसे कहते हैं दुकानदारी। मराठियों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए (यह बहस का अलग मुद्दा हो सकता है कि ऐसा करने से उनकी जगह मराठियों के बीच बनी या नहीं) मराठी भाषा का झंडा उठा लें और फिर देश और दुनिया के सामने अपनी बात रखने के लिए हिंदी में बात करें। वह कह रहे हैं कि भाषा के नाम पर अबू आजमी के साथ मारपीट कर उन्होंने 11 करोड़ मराठियों का सम्मान किया है। यह अलग बात है कि यह 11 करोड़ मराठी उनका कितना सम्मान करते हैं। रामदास कदम और उनकी पार्टी का मराठियों के बीच क्या सम्मान है यह देखना हो तो देख सकते हैं कि महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों पर हुए चुनाव में राज की पार्टी एमएनएस के पास मात्र 13 सीटें आई हैं। इस पार्टी को समझना चाहिए कि अगर यही रवैया रहा तो अगले चुनाव में ये अपनी पार्टी का तीन तेरह कर लेंगे। बहरहाल, रामदास कदम की आज की हरकत ने मुझे अनामदास की एक पोस्ट की याद दिला दी। मी मंदबुद्धि मुंबईकर बोलतो आहे नाम की यह पोस्ट अनामदास ने अपने ब्लॉग 'अनामदास का चिट्ठा' में 2 फरवरी 2008 को लिखी थी। लगा मंदबुद्धि रामदास कदम की करतूत के बहाने अनामदास की यह पोस्ट एक बार फिर आप सबों के सामने रखी जाये।

-अनुराग अन्वेषी

'मैं

अकेला नहीं है, मेरे साथ 'ठोक रे' जी की सशक्त विचारधारा है, हमारे साथ तोड़फोड़कर है, काँचफोड़े है, माचिसमारे है, भाईतोड़े है. हमने बहुत अन्याय सहा है, अब नहीं सहेंगे, झुनका-भाखर आधा पेट खाके हम पहले ढोकला-थेपला वालों से लड़े, फिर इडली-सांभर वालों से, उसका बाद लिट्ठी-चोखा वालों से भी लड़ेंगे.
हमारे साथ शुरू से अन्याय हुआ है. अँगरेज़ों से भी पहले मुगलों के जमाने में कोल्हापुर-सोलापुर-ग्वालियर-इंदौर तक हमारा राज रहा है लेकिन हमें आज़ादी के बाद गुजरातियों के ताबे में ला दिया, मुंबई का चीफ़ मिनिस्टर वलसाड़ का गुजराती मूत्रपायी देसाई को बनाया, मराठवाड़ा में कोई मरद माणूस नहीं था मुख्यमंत्री बनने के लिए. कहने को स्टेट का नाम मुंबई था लेकिन आज़ादी के तेरह साल बाद तक हमने भाऊ की जगह भाई को, पाटील के बदले पटेल को झेला. 1960 में जाकर हमें अलग स्टेट मिला माझा महाराष्ट्र.
आमची मुंबई अब स्टेट से कैपिटल बना, ठोक रे साहब ने देखा कि मराठी मानूस कार्टून बन गया है वो कार्टून बनाना छोड़ दिया और बाघ छाप का लाकेट बनाया जो हमने अपना गला में लटकाया. पहले सब सापड़-उडुपी बंद करा दिया, हमारा इधर का नौकरी में कोई दामले नहीं, कांबले नहीं, तांबे नहीं, पुणतांबेकर नहीं, सब वरदराजन, अय्यर, पिल्लै, अयंगार...उनको गुस्सा ऐसे नहीं आया. जो 'सामना' नहीं पढ़ता उसको कइसा समझ आएगा इतना बड़ा साजीश?
साजीश तो बहुत हुआ मराठियों के खिलाफ, दाऊद,शकील और अबू सालेम भाई लोग सब मुसलमान है, शेयर मार्केट हमारा है लेकिन उधर सोपारीवाला-खोराकीवाला-चूड़ीवाला है, फिल्म इंडस्ट्री हमारा है लेकिन उधर भी खान-कपूर है, क्रिकेट खेलता है तेंदुलकर-कांबली मगर कप्तान बनता है अज़रुद्दीन-गंगोली, मराठी पार्टी बनाई उसमें भी रायगढ़ का नहीं, रोहतास का बिहारी भइया संजय निरूपम एमपी बन गया, तांबे-खरे-खोटे सब किधर जाएँगे? उनके पास भिड़े होने के सिवा उपाय क्या है बोलो.
बोलते हैं कि भइया लोग नहीं होंगे तो दूध नहीं मिलेगा, टैक्सी नहीं चलेगा, सब्ज़ी नहीं मिलेगा, मैं कहता हूँ झुग्गी नहीं रहेगा, कचरा नहीं रहेगा, बास नहीं रहेगा...हम म्हाडा वन बेडरूम फ्लेट में गाय बाँधेंगे, टैक्सी नहीं बेस्ट का बस में जाएँगे, अमिताभ बच्चन नहीं श्रेयस तलपड़े का सिनेमा देखेंगे...
इन्हीं मराठी विरोधी प्रवृत्तियों और लोकशाही विरोधी पत्रकारों से निबटने के लिए हमारे ठोक रे साहब ने शिवाजी की प्रेरणा से सेना बनाई. हमारी सरकार बनी लेकिन दुर्भाग्य है कि बालासाहेब का भतीजा उनके बेटे जैसा दिखता है और बेटा किसी और के जैसा...इस पर भी हमारे दुश्मन ठोक रे साहेब का चरित्रहनन करते हैं.
उन्होंने देश का कितना काम किया, भारत-पाकिस्तान मैच का विरोध किया, कितना फ़िल्म का मातुश्री में स्पेशल स्क्रीनिंग कराके राष्ट्रविरोधी सीन कटवा दिया, कितनी मराठी मुल्गियों को रोल दिला दिया.
घर की बात है, मैं बाहर नहीं बोल सकता लेकिन उद्धव ठंडा है, इसीलिए ठोक रे साहब ने अपना ट्रेनिंग,आशीर्वाद और पार्टी का कमान राज को दिया था लेकिन घर का झगड़ा में उद्धव ने ठोक रे साहब को ठग लिया. राज ने सिद्धांत वही रखा है जो ठोक रे साहेब से सीखा है, बोलने का लोकशाही-करने का ठोकशाही. ठोक रे साहब को आज तक किसी ने नहीं ठोका, राज का राज नहीं है तो क्या हुआ एक दिन ज़रूर आएगा, तब तक उसका राज हमारे दिल पर है".
इतना कहकर मनोज तिवारी के घर से आ रहा मंदबुद्धि मुंबईकर भोजपुरी के दूसरे स्टार रविकिशन के घर की ओर रवाना हो गया है.
मेरा इतना ही कहना है कि मंदबुद्धि मुंबईकर कम ही मिलते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वाघमारे ने कभी बाघ नहीं मारा होता, पोटदुखे के पेट में दर्द शायद ही होता है और हर पांचपुते से पाँच बेटे हों यह ज़रूरी नहीं है. मराठियों का जेनरलाइज़ेशन करने का इरादा बहुत ख़तरनाक है, उसके बारे में सोचना भी पाप है, इरादा सिर्फ़ उन मुंबईकरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का है जिनकी भावनाएँ निर्मल नहीं हैं.
शिव सेना और उसके मानस पुत्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से सहानुभूति न रखने वाले सभी मराठियों से क्षमा याचना सहित, ख़ास तौर पर जिनके सरनेम का यहाँ इस्तेमाल हुआ है, सिर्फ़ प्रांतवादी मानसिकता का उपहास करने के लिए. राज ठाकरे का समर्थक होने के लिए मराठी होना ज़रूरी नहीं है, आप जहाँ हैं वहाँ राज ठाकरे टाइप लोगों को टाइट रखें वर्ना आप भी पाप के भागी होंगे.

Tuesday, November 3, 2009

घर की याद

भवानी प्रसाद मिश्र ने यह कविता जेल में लिखी थी। चूंकि वह भी देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ रहे थे, लिहाजा, कुछ वक्त के लिए अंग्रेजों ने उन्हें भी जेल में कैद कर लिया था। जब वह जेल में थे बारिश का मौसम था। तेज बारिश हो रही थी। घर की याद उन्हें बेतरह आ रही थी। तो उस वक्त उन्होंने घर को याद कर जो लिखा, वह हमारे सामने 'घर की याद' कविता के रूप में सामने आई। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं की एक बड़ी खासियत है उसमें इस्तेमाल सहज-सरस शब्द। जितने आसान शब्द उतनी ही नायाब अभिव्यक्ति। काश! ऐसी अभिव्यक्ति का सलीका हमारे पास भी होता...






आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,

अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सो कर सिर्फ़ माना -

क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रात वाली छाप है सब,

गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सरसर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,

बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,

घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!

आज का दिन-दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,

घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,

और माँ बिन-पढी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फ़िर,

माँ कि जिसकी स्नेह धारा,
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नही आता,
जो कि उसका पत्र पाता।

और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक घिर रहा है,
पिताजी भोले औ' बहादुर,
वज्र-सा भुज, नवनीत-सा उर,

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलायें,

मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,

आज गीता पाठ कर के,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,

अब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,

चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनको पड़े होंगे।

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,

पाँचवां मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,

आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उनपर सुहागा,
बँधा बैठा हूँ अभागा,

और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा,
आँख में किस लिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,

वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,

पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,

पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ।

गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात दिन कि झड़ी झारी।

खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,

तुझे बतलाता कि बेला,
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,

मैं न रोऊँगा - कहा होगा,
और फ़िर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवें कि याद का रे,

भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी, सहज तरला,

शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा,
आज सबका मन चुआ होगा,

अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,

ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरनें झुकें-झाकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दें ज्यों,

गगन-आँगन कि लुनाई,
दिशा के मन में समाई,
दश-दिशा चुपचाप हैं रे,
स्वस्थता कि छाप हैं रे,

झाड़ आँखें बंद करके,
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिना चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं,

एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,

तू ज़रा-सा दुःख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,

हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,

तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुःख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे,

पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,

एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धरा फूट जाए,
एक हलकी चोट लग ले,
दूध कि नदी उमग ले,

एक टहनी कम न होले,
कम कहाँ कि ख़म न होले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी, जड़ें उतनी।

इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,

मैं मजे में हूँ सही है,
घर नही हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,

किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,

काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते हैं लोग कहना,
मत करो कुछ शोक कहना,

और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,

कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुःख डटकर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,

हाय रे ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,

कह न देना मौन हूँ मैं,
ख़ुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे बरसें,
पाँचवें को वे तरसें।

Tuesday, October 27, 2009

अश्लील कौन : मकबूल फिदा हुसैन, बिहारी लाल, प्रेमचंद या कि हम


मैं
ने कई बार कई जगहों पर पढ़ा और सुना है कि मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू देवी-देवताओं की कई अश्लील पेंटिंग बनाई थी। इसी कड़ी में सरस्वती की तस्वीर भी थी। गर एम. एफ. हुसैन का विरोध इसी मुद्दे पर हिंदू कर रहे हैं तो मुझे लगता है कि मकबूल फिदा हुसैन वाकई हिंदू जनमानस को बहुत करीब से समझते हैं। क्योंकि सिर्फ इसी बात को मुद्दा बना कर विरोध करने वालों के भीतर बसी सरस्वती वाकई नंगी है, वरना उन्हें यह समझ होती कि चंद लकीरों से उकेरी गई कोई नंगी तस्वीर मां सरस्वती की कैसे हो सकती है?

मां सरस्वती के जिस रूप को हम और आप बचपन से जानते रहे हैं वह तो धवल वस्त्रों में लिपटी हुई हंसवाहिनी और वीणावादिनी वाली मुद्रा है। उनके चेहरे पर गरिमामयी मुस्कान है, ओज है...और पता नहीं क्या-क्या। यानी, उक्त गुणों में से कोई भी एक गुण जिस तस्वीर में हमें न दिखे, वह मां सरस्वती की तस्वीर हो नहीं सकती, भले ही कोई लाख चीख-चीख कर क्यों न बोले। क्या आप किसी ऐसी तस्वीर को मां सरस्वती की तस्वीर के रूप में स्वीकार करना चाहेंगे जो हंस के बदले कौवे पर बैठी हो? जाहिर है नहीं। तो फिर बगैर कपड़े वाली तस्वीर में आपको मां सरस्वती कहां से दिख गई?

कहना यह चाहता हूं कि भले ही हुसैन ने उस तस्वीर पर लिख दिया हो सरस्वती, पर वह आपकी 'मां सरस्वती' नहीं है। फर्ज कीजिए सरस्वती की जगह उसने लाली लिखा होता, तब भी क्या आप इसी तरह विऱोध करते? या फिर काली लिखा होता तो क्या करते? क्योंकि यह तो कड़वा सच है कि कपड़ों के संग तो काली की कोई तस्वीर अभी तक नहीं दिखी। हां, हर तस्वीर में कलाकार यह कमाल जरूर दिखाता है कि मुंडमालाओं से उनके अंग विशेष लगभग ढक जाते हैं।

आपके इस विरोध के क्रम में आपको एक घाटा यह जरूर हुआ कि आप हुसैन की एक लाजवाब पेंटिंग को निहारने से चूक गए। उनके सधे ब्रश स्ट्रोक्स और कलर कॉम्बिनेशन की तारीफ करने का अवसर आपके हाथ से फिसल गया। इतना ही नहीं विरोध के दौरान आपने अपनी एनर्जी जाया की। यही एनर्जी अगर बचा कर रखी जाये, अपने आक्रोश को अगर आप तरतीब देना सीख जायें तो शायद इस समाज में हर दिन उतर रहे किसी काली, किसी दुर्गा, किसी सरस्वती, किसी लक्ष्मी, किसी राधा, किसी सीता, किसी द्रौपदी के वस्त्र की रक्षा कर सकेंगे।

इस तरह, उनकी बनाई तस्वीर अश्लील नहीं थी। मकबूल जैसे कलाकार को हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई जैसी श्रेणी में बांटना, मुस्लिम होने के नाम पर उनका विरोध करना और उनकी बनाई किसी न्यूड स्त्री की तस्वीर में मां सरस्वती का रूप देखना वाकई अश्लील है।

शब्दों से भी तस्वीर बनाई जाती है। रीतिकाल के कवियों ने नायक और नायिका के कार्य-व्यापारों का वर्णन पूरे मनोयोग से किया है। उनकी रचनाएं हिंदी साहित्य के कोर्स का हिस्सा तो हैं ही, हिंदी साहित्य के इतिहास में उनका स्थान बहुत ऊंचा भी है। पर इस देश में यह भी मुमकिन है कि अचानक कोई स्वयंभू आलोचक पैदा हो जाये और कहे कि ये रीतिकालीन कवि तो बेहद कमबख्त थे। बड़ा ही अश्लील साहित्य रचते थे।

ये लोकतांत्रिक देश है। धूमिल ने लिखा था - मेरे देश का प्रजातंत्र / मालगोदाम में लटकी बाल्टी की तरह है / जिस पर लिखा होता है आग / और भरा होता है / बालू और पानी / ...। तो इस देश के लोकतंत्र ने धूमिल की इन पंक्तियों को खारिज करते हुए बताया कि बालू और पानी नहीं भरा होता है, हममें आग ही भरा है। यह लीजिए जिस प्रेमचंद को आप सम्मान देते हैं, उसे तो लिखने का भी शऊर नहीं था। जाति-विशेष के लिए असम्मानजनक टिप्पणी लिखने का दुस्साहस किया था उसने, सो देखिए उसकी किताबों का हश्र। कैसे धू-धू करके आग में जल रही हैं।

मित्रो, बताएं आप कि प्रेमचंद का लिखना अश्लील था या उनकी किताबों को जलाना या फिर जलती किताबों को देख कर भी हमारा चुप बैठना?

Wednesday, October 7, 2009

मुंहबोली बहन से रिश्ता अवैध है?

आज से नवभारत टाइम्स डॉट कॉम ने अपनी वेबसाइट पर ब्लॉग की शुरुआत कर दी है। कुल 12 ब्लॉगर्स हैं फिलहाल। जाहिर है यह संख्या बढ़ेगी। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक या कह लें कि तमाम तरह के मुद्दों पर वहां चर्चा होगी। मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स डॉट कॉम पर आया है।

-अनुराग अन्वेषी



लां की पत्नी फलां के साथ भाग गई या फलां के पति का फलां से अवैध संबंध है - ऐसी बातें हम और आप अक्सर सुनते आए हैं। कई बार तो इसे अफवाह कहकर हम लोग लाइटली लेते हैं, पर कई बार ऐसी बातों पर हुआ रिऐक्शन सारी हदें पार कर जाता है। कुछ की जान जाती है, कुछ घायल होते हैं। बाद में पूरा प्रकरण जब मीडिया में आता है तो उसे अवैध संबंधों के खिलाफ उपजे आक्रोश की परिणति के तौर पर लोग स्वीकार कर लेते हैं।

पर अक्सर मेरे मन में एक सवाल कुलबुलाता है कि क्या कोई संबंध अवैध भी हो सकता है। दरअसल, संबंध तो अच्छे और बुरे होते हैं। अवैध तो उसे हमारा स्टेटमेंट करार देता है। यानी, जिन रिश्तों का हम पुरजोर विरोध करना चाहते हैं, जिन रिश्तों का बनना और बने रहना हमें कुबूल नहीं होता उनके लिए विशेषण के तौर पर अवैध शब्द का इस्तेमाल हम कर लेते हैं। अपनी नफरत और नापसंद को व्यक्त करने वाला कोई शब्द तलाशने की बजाए हम उस रिश्ते को खारिज करने की कोशिश करते हैं। उसे सामाजिक संदर्भ में इलीगल घोषित कर देते हैं। गौर से देखें तो 'अवैध' शब्द हमारे नफरत के एक्स्प्रेशन को नहीं रखता, बल्कि हमारे द्वारा जारी किए गए फतवे को रखता है। यह अलग बात है कि सामाजिक ठेकेदारों द्वारा घोषित इस फतवे को हम फतवे की तरह नहीं समझते बल्कि उसका सामाजिक संदर्भ तलाशते हुए जस्टिफाई करते हैं। क्योंकि अवैध करार देने के फतवे के बारे में 'निठल्ला चिंतन' करने का वक्त भेड़चाल में शामिल लोगों के पास बेहद कम होता है।

ऐसे शब्द का इस्तेमाल करने वालों का विरोध जताने के लिए क्या मुझे यह कहना चाहिए कि अवैध शब्द का इस्तेमाल वे अवैध तरीके से कर रहे हैं? मेरी निगाह में इस शब्द का इस्तेमाल मुझे इस संदर्भ में नहीं करना चाहिए।

क्या किसी ऐसे रिश्ते को हमें 'वैध' कहना चाहिए जिसमें पति-पत्नी दोनों साथ तो रहते हों, पर जब भी साथ चलते हों एक-दूसरे का पैर कुचलते हों, लड़खड़ा कर बार-बार गिरते हों और हर बार घायल होकर फिर खड़े होते हों, साथ चलने के लिए नहीं, लड़ने के लिए? या उस रिश्ते को 'वैध' कहना चाहिए जहां परस्पर दो अजनबियों के बीच पहचान बनती है, फिर वह बढ़ती है, एक-दूसरे का सुख-दुख समझती है, साझा करती है, तमाम दुख और तकलीफ के बीच साझे सुख की तलाश करती है?

जब रिश्तों की बात चल निकली है तो यह जरूर बताएं कि रिश्तों को 'अवैध' घोषित करने का आपका पैमाना क्या है? क्या वंश परंपरा के खांचे में जिन रिश्तों को देखते-सुनते आए हैं, या समाज के पारंपरिक ढांचे में जिन रिश्तों को जीते आए हैं, सिर्फ वही 'वैध' हैं? उससे इतर सारे रिश्ते 'अवैध'? वाकई, अगर आपका पैमाना यही है, तो कहना चाहूंगा कि अपने भीतर की इस जड़ता को जितनी जल्द हो सके तोड़ डालें। बंधु! रिश्तों की दुनिया बहुत बड़ी और बहुत जटिल है। इसका बहाव आपके छोटे-मोटे फतवे नहीं रोक सकते। किसी रिश्ते को यूं खारिज भी नहीं कर सकते आप।

क्या अब तक किसी ऐसे बाप के खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोशिश की है आपने, जिसने 'वैध' बेटी के साथ बलात्कार किया? या किसी ऐसे 'वैध' भाई, मामा, चाचा... की गर्दन पकड़ी है आपने, जिसने अपनी करतूत से अपनी 'वैध' बहन, भगिनी, भतीजी... को डर और घृणा के जंगल में पहुंचा दिया? क्या ऐसे नामाकूलों के रिश्ते वाकई 'वैध' हैं? क्या ऐसे लोग रिश्ते का एक कतरा भी पहचानते हैं? आए दिन वंश परंपरा और सामाजिक खांचे को तोड़ने वाली खबरें आपके 'वैध रिश्तों' की पोल खोलती हैं। फिर भी आप वैध और अवैध के पचड़े से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

इस 'अवैध' का पैमाना तलाशने में एक संदेह और सिर उठा रहा है। दो अलग-अलग वर्ण, समुदाय या देश के लड़का और लड़की एक-दूसरे के परिचित हो जाएं और एक-दूसरे को भाई-बहन मानें, तो आपकी निगाह में यह भी 'अवैध रिश्ता' होगा। होना ही चाहिए, क्योंकि इन दोनों के रिश्ते में न तो कोई एक वंश परंपरा है, न कोई समाज परंपरा। तब तो फिर इस अर्थ में तमाम मुंहबोली बहनों और मुंहबोले भाइयों के रिश्ते 'अवैध' हैं?

उम्मीद है यहां पर आपका जवाब 'ना' होगा। और इस 'ना' के पीछे तर्क होगा कि भाई-बहन के रिश्ते पवित्र होते हैं, इस रिश्ते में सेक्स की कोई जगह नहीं होती। यानी, ले-देकर फिर आप अपने उसी मर्दवादी नजरिए के साथ खड़े हो गए, जहां वैध-अवैध रिश्तों को परिभाषित कर रहा है गैर स्त्री-पुरुष से बना शारीरिक संबंध।

जरा सोचें, एक स्त्री या पुरुष का शारीरिक संबंध दूसरे पुरुष या स्त्री से क्यों बन जाता है। इसकी पड़ताल के लिए हमें सामाजिक ढांचे की ओर लौटना होगा। इस समाज में हर शख्स एक साथ कई-कई भूमिकाओं में जीता है। स्त्री है, तो वह किसी की मां होगी, किसी की बेटी, किसी की बहू, किसी की सास, किसी की पत्नी, किसी की बहन, किसी की दोस्त किसी की दुश्मन भी....। इसी तरह पुरुष भी कई भूमिकाओं को जीता है। कई भूमिकाओं की जरूरत क्यों पड़ जाती है? इसीलिए तो कि मन और तन की तमाम परतों की अलग-अलग जरूरतें हैं। इन जरूरतों को किसी एक भूमिका में रहते हुए किसी एक चरित्र के साथ पूरा नहीं किया जा सकता।

जीवन में सेक्स की पूर्ति उतनी ही अनिवार्य है जितना जिंदा रहने के लिए सांस लेना। पैदा हुआ बच्चा जब मां का दूध पीता है तो उसका एक हाथ अपनी मां की छाती पर होता है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसा करने से बच्चे के भीतर सहज रूप से (पर अचेतन में) बह रही सेक्स की भूख शांत होती है। बच्चे के अंगूठा पीने को मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसा होने की वजह 'कामक्षुधा की पूर्ति' है।

जब यह काम तत्व हमारे जीवन में बचपन से रचा-बसा है, तो इसकी आधी-अधूरी पूर्ति किसी भी शख्स को भटका सकती है। आपका तर्क हो सकता है कि ऐसा नहीं है वर्ना भटकने वालों की भीड़ दिखती रहती। मैं भी सहमत हूं आपकी बात से। पर यह भी देखें कि भटकने वालों की बड़ी जमात तो नहीं है इस देश में, पर न भटकने की वजह से तरह-तरह के अवसादों से घिरे लोगों की जमात तो है ही अपने सामने। हां, भटकने वालों का परसेंटेज कम है। पर इन 'कम लोगों' के भटक जाने का दोषी आखिर है कौन? जाहिर तौर पर उनका पार्टनर। अगर उसने अपने बेचैन और अतृप्त पार्टनर का ख्याल रखा होता तो भटकने की नौबत तो नहीं ही आती, आपको अवैध का फतवा भी जारी नहीं करना पड़ता। यहां पर एक सवाल और - फिर भटकने वाला दोषी कैसे हुआ? जाहिर है यहां मैं अब भी आपके खिलाफ और 'अवैध' संबंध वालों के पक्ष में खड़ा हूं। यह बहुत सहज-स्वाभाविक धारा है, इसे समझने की कोशिश करें, फतवे जारी कर रोकने की नहीं।

चलते-चलते बचपन में सुनी एक बात आपसे शेयर करता चलूं। एक छींक का मतलब होता है - शुभ। दूसरी छींक का अशुभ, तीसरी छींक घोर अशुभ। चौथी-पांचवीं-छठी-सातवीं-आठवीं छींक लगातार आए तो शुभ-अशुभ के फेर से निकल आएं और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें क्योंकि ये जुकाम होने के संकेत हैं। कहने का मतलब यह कि किसी के एक-दो से अगर किसी के शारीरिक संबंध बन भी गए हों, तो उसे नजरअंदाज करें, पर अगर ऐसे संबंधों की संख्या तीन, चार, पांच, दस होने लगे, तो मेरी गुजारिश है; कृपया मेरे तर्कों को नजरअंदाज कर मान लें कि यह गंभीर केमिकल लोचा है, जिसे हम व्यभीचार के रूप में जानते हैं।

Friday, August 28, 2009

अब विवेक की कविता उड़ा ली गई

विवेक ने एक बेहद खूबसूरत कविता लिखी है। यह कविता उसने हरियाणा से लौटने के बाद लिखी थी। शीर्षक है - कत्ल से पहले बहनें, बहनों के कत्ल के बाद। उसके ब्लॉग 'थोड़ा सा इंसान' पर 27 जुलाई की पोस्ट है यह। बेशक संवेदना को झकझोर कर रख देने वाली कविता है। आप भी सुनें। पर सिर्फ सुने ही नहीं, बल्कि यह भी सोचें कि यह जो भाई नाम का जीव है वह बहनों के कत्ल से पहले भी मर्द है और बहनों के कत्ल के बाद भी मर्द है, आखिर क्यों? कैसे बदले यह स्थिति, कैसे बदले उसका मर्दवादी सोच?

Tuesday, July 28, 2009

उसका सुख मेरे सुख से बड़ा कैसे?

यह है मणिराम। हिंदी में एमए पास का दावा करनेवाले इस रिक्शेवाले से मेरी मुलाकात तकरीबन 10 दिन पहले हुई थी। पिछले शनिवार को नवभारत टाइम्स के कॉलम 'आंखों देखी' में इसे जगह मिली। हालांकि आज जब मैं इसे अपने ब्लॉग पर पब्लिश कर रहा हूं, तीखी धूप को कल रात हुई बारिश बहा ले गई है। पर मणिराम से मिलने के बाद जो कसक पैदा हुई मन में उसका तीखापन अब भी बरकरार है।

-अनुराग अन्वेषी



ती
खी धूप है। दफ्तर जाने के लिए सोसाइटी से बाहर निकला हूं। रिक्शावाला पूछता है - कहां जाना है? मैंने चुटकी ली, जाना तो है बहुत दूर, कहां पहुंचा सकते हो? रिक्शावाला हाजिरजवाब निकला, कहता है जिन्हें मंजिल का पता होता है, वह दूसरों के सहारे के बगैर ही पहुंचते हैं। मुझे अच्छी लगी उसकी हाजिरजवाबी। बात जारी रखता हूं। पूछता हूं कि गर्मी का क्या हाल है? तपाक से कहता है, लोग पिघल रहे हैं, भगवान नहीं। मन ही मन चौंकता हूं, पर उसके सामने जाहिर नहीं होने देता। थोड़ी चुप्पी बन गई। फिर मैंने उससे पूछा, सिगरेट जलाना है, माचिस है तुम्हारे पास? छूटते ही उसने कहा, जलाते हो सिगरेट, जलते हो आप, क्यों साब? कैसा है यह हिसाब?

अब मुझे लगा कि उससे उसका परिचय तो पूछ ही लूं। उसने बताया मध्यप्रदेश का रहने वाला है वह। नाम है मणिराम। हिंदी में एमए कर रखा है उसने। पर कोई रोजगार नहीं मिला, तो अपने एक परिचित के साथ चला आया गाजियाबाद के वसुंधरा में। मैट्रिक तक पढ़ी उसकी पत्नी दूसरों के घरों में बर्तन-बासन, झाड़ू-पोंछा करती है। वह खुद रिक्शा चलाता है। दोनों मिलकर महीने में तकरीबन 5000 रुपये कमा लेते हैं।

उसके पढ़े-लिखे होने की बात सुन लेने के बाद इस व्यवस्था के प्रति मन इतना खट्टा हो जाता है कि मेरे पास कहने को कुछ नहीं रह जाता। बावजूद, जबर्दस्ती बातचीत जारी रखता हूं। किस दौर की कविता तुम्हें ज्यादा पसंद है, मैं पूछता हूं मणिराम से। पर सच है कि मैं उसका परिचय सुनने के बाद अपने से जिरह करने लग गया हूं। मैं भी हिंदी में एमए पास हूं। सोचता हूं वह पढ़ाई-लिखाई में जितना भी गया गुजरा होगा तो भी कई ऐसे लोगों से बेहतर होगा जो आज उसका दस गुणा कमा रहे हैं। पर मणिराम अपनी स्थिति से संतुष्ट है। उसे जिंदगी से शिकायत नहीं। एक तरफ मेरे जैसे लोग हैं जो शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठे हैं। जरा सी कोई बात हुई नहीं कि काट खाने को दौड़ेंगे। मैं पसीने से तरबतर हो चुका हूं। जेब से रुमाल निकालता हूं चेहरा पोंछने के लिए और मणिराम इस भरी दोपहर में पूरे इत्मीनान के साथ रिक्शा खींच रहा है। जयशंकर प्रसाद की पंक्तियां सुनाता हुआ - हिमाद्री तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्वला, स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढ़े चलो... साब जी मंडी आ गयी। यहीं मेरी तंद्रा टूटती है। रिक्शे से उतर कर मणिराम को पैसे देता हूं। ऑटो वाला मेरे इशारे पर रुक चुका है। ऑटो में बैठ कर जा रहा हूं, पर मुझे लगता है कि मैं अब भी रुका हूं मणिराम के पास, अपनी खुशियां, अपनी संतुष्टि तलाशता हुआ। लगता है, एमए बहुत दूर की बात है, मैंने तो अभी जिंदगी की पहली कक्षा की भी पढ़ाई नहीं की।

Tuesday, June 30, 2009

दफ्तर में करने को कुछ नहीं, ये है न !

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Tuesday, June 2, 2009

सात सुरों की धुन (पापा का ब्लॉग)

साथियो, आज से मेरे पापा ने भी ब्लॉगिंग शुरू कर दी। ब्लॉग का नाम रखा है सात सुरों की धुन। उनका इरादा है कि इस ब्लॉग पर वह अपनी कविता, गीत और गजल पोस्ट किया करेंगे। लेख, कहानी, आलोचना या समीक्षा के लिए एक दूसरा ब्लॉग वह तैयार कर रहे हैं। उसका नाम दिया है उन्होंने - जो अनकहा रहा।
तो फिर आप देखें उनका पहला ब्लॉग - सात सुरों की धुन

Wednesday, May 27, 2009

आप भी देखें मेरी दुर्दशा


रमणजीत के हर इलस्ट्रेशन में एक नई चमक दिखती है, एक नया आयाम दिखता है। उन्होंने मेरे आग्रह पर यह इलस्ट्रेशन तैयार किया। और सच कहूं तो इस इलस्ट्रेशन को देखने के बाद मेरा परिचय मेरे चेहरे की कुछ लकीरों से हुआ। कितना रोमांचक होता है अपने चेहरे को दूसरे के ब्रश से जानना! वाकई, रमणजीत बढ़िया कलाकार हैं।

Thursday, May 7, 2009

मत करें दान, करें मतदान

गीदड़ कहता शेर से
नया जमाना देख
एक वोट तेरा पड़ा
मेरा भी है एक

पता नहीं किसकी पंक्तियां हैं यह। पर यह सच है कि वह जमाना लद गया जब शेर जैसे लोग बाकी तमाम लोगों को गीदड़ सरीखा समझते थे। अपनी गीदड़ भभकियों से सबको डराते फिरते थे। साथियो, लोकतंत्र का यह पर्व इस बार हमारे लिए शर्मनाक हादसा न बने, इसके लिए बेहद जरूरी है कि हम अपनी खोल से बाहर निकलें। विचार करें, अंधों की जमात में बैठे किस काने राजा को वोट देना है। ऐसे ही बदलेंगी स्थितियां। आज अंधों में काना राजा दिख रहे हैं कल कानें राजाओं के बीच आंख वाले सेवक दिखलायी देंगे। इस बदल रही व्यवस्था को पूरी तरह हम और आप ही बदल सकते हैं इसलिए वाकई यह जरूरी है कि तमाम जरूरी काम को हाशिये पर रख इस जरूरी महापर्व में हम शरीक हों। अंत में कहना सिर्फ इतना है कि मत करें दान, करें मतदान।

Wednesday, May 6, 2009

संकोच में फंस गया हूं

नमिता जोशी मेरी अच्छी दोस्त हैं। उन्होंने मुझे एक मेल किया और जिद ठान ली कि इसे मैं पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर डालूं। संकोच के साथ मैं उनकी इस जिद भरी गुजारिश पूरी कर रहा हूं।

-अनुराग


आज आप सब लोग जिरह के सरताज अनुराग अन्वेषी जी को जन्मदिन की शुभकामनाये दे सकते हैं. आज ही के दिन इस कलाकार ने इस धरती पर कदम रखा था. शब्दों के जादूगर अनुराग को मेरी ओर से happy Birthday .. इसके साथ ही आज के दिन आप सब यह भी बताये की अनुराग जी के बारे में आप क्या सोचते हैं...
-namita